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‘सच्चा राही’ के एडीटर का परिचय स्वयं एडीटर के कलम से

नाम : हारून रशीद सिद्दीक़ी पुत्र मुहम्मद इस्हाक़ सिद्दीक़ी

जन्म स्थान : ग्राम पूरा रज़ा खाँ, पोस्ट सरैंठा, जनपद फैजाबाद, उ0 प्र0

जन्म तिथि : 11 अगस्त 1933 ई0

षिक्षा : मिडिल प्रथम श्रेणी, हाई स्कूल तथा इन्टर व्यक्तिगत से पास किया, लखनऊ यूनीवर्सिटी से प्रथम श्रेणी में बी0ए0 पास किया फिर उर्दू में एम.ए. तथा पी.एच.डी. की डिग्रियां प्राप्त कीं, मुअल्लिमे उर्दू का इम्तिहान पास किया, किंग सऊद यूनीवर्सिटी (रियाज़, सऊदी अरबिया) से एम.ए. की डिग्री प्राप्त की, कुआर्न मजीद हिफ़्ज़ किया।

सेवायें : 1955 ई0 से 1959 ई0 तक ‘‘खानकाह व मदरसा अबू अहमदिया’’ गुल चप्पा कलां, आलियाबाद जिला बाराबंकी में मुदर्रिस रहा। 1960 ई0 में नदवतुल उलमा लखनऊ के लिए चन्दा वसूली का काम किया। 1961 ई0 से 1963 ई0 तक तब्लीगी मरकज़ की मस्जिद के मकतब लखनऊ में नदवे की तरफ़ से मुदर्रिस रहा। मार्च 1963 ई0 में मदरसा सानविया दारुल उलूम (जिसका नाम बाद में ‘‘माहद’’ हो गया) में मुदर्रिस हो कर आ गया और 1978 तक वहीं मुदर्रिस रहा, इस दरमियान शाम के वक़्त में माहनामा ‘‘रिज़वान’’ के दफ़्तर में काम करता रहा।
1979 ई0 में किंग सऊद यूनिवर्सिटी से इस्कालरषिप के साथ पढ़ने का वीजा मिल गया। 1979 से 1985 तक किंग सऊद यूनिवर्सिटी का छात्र रहा।
1986 ई0 में फिर मुल्क वापस आ कर दारुल उलूम नदवतुल उलमा में पढ़ाने का काम शुरु किया। 1987 में माहद दारुल उलूम का हेड मास्टर बनाया गया और जब माहद, दारुल उलूम से 11 कि0मी0 दूर सिक्रौरी चला गया तो 2000 ई0 में मुझे ‘‘षो-बए-तामीर व तरक्की’’ में ‘‘मुआविन नाज़िरे शोबा’’ के पद पर रखा गया। 2002 में जब ‘‘सच्चा राही’’ का इजरा हुआ तो मुझे उस का एडीटर नियुक्त किया गया। जब ‘‘मज्लिस सहाफत व नषरियात’’ के सिक्रेटरी जनाब प्रोफेसर अतहर हुसैन को मोतमद माल बनाया गया तो मुझे ‘‘मुआविन सिक्रेटरी’’ का पद दिया गया।

अब तक यह तीनों पद-
1). मुआविन नाज़िर शोबा तामीर व तरक्की नदवतुल उलमा।
2). मुआविन सिक्रेटरी मज्लिसे सहाफत व नषरियात नदवतुल उलमा, लखनऊ।
3). एडीटर सच्चा राही नदवतुल उलमा, लखनऊ बाकी हैं, आगे अल्लाह मालिक है।

उलमा से तअ़ल्लुक़
पूरी जिन्दगी अच्छे उलमा के बीच गुज़री उनकी गिन्ती मेरे लिए सम्भव नहीं है अलबत्ता कुछ बड़े उलमा का ज़िक्र करता हूंः-
हज़रत मौलाना मुहम्मद अब्दुष्षकूर फारूक़ी रह0 से सन् 1956 में बैअ़त हुआ, उनके देहान्त के बाद शैखुल हदीस हज़रत मौलाना मुहम्मद ज़करिया रह0 से बैअ़त हुआ और अब हज़रत मौलाना सय्यिद मुहम्मद राबे ह़सनी दामत बरकातुहुम से तअ़ल्लुक़ है।
हज़रत मौलाना अली मियां रहमतुल्लाहि अलैहि से सन् 1956 ई0 में तअ़ल्लुक़ हुआ और आख़िर दम तक गहरा तअ़ल्लुक़ रहा, उनकी कई उर्दू तसानीफ़ का इमला मैंने लिखा है खासतौर से ‘‘हयात अब्दुलह़यी’’ का इमला तकिया कलां रायबरेली में क़ियाम करके लिखा है।
हज़रत मौलाना मुहम्मद मंज़ूर नौमानी रह0 से सन् 1958 ई0 में ताल्लुक़ हुआ और आख़िर दम तक अच्छा तअ़ल्लुक़ रहा। सबसे क़रीबी और खास तअ़ल्लुक़ मौलाना मुहम्मद सानी हसनी रहमतुल्लाहि अलैहि से रहा, मैं 16 साल उनकी ख़िदमत में रहा उन्हीं से सहाफत सीखी और सहाफत की सनद भी ली।

लिखने का कामः
सन् 1964 ई0 से सन् 1976 ई0 तक मेरे मज़ामीन माहनामा रिज़वान में छपते रहे, तामीर ह़यात में एक साल से ज़ियादा तक ‘‘बच्चों का सफह़ा’’ लिखता रहा।

किताबेंः
पी.एच.डी. का मक़ाला ‘‘हक़ीम सय्यिद फखरुद्दीन ख़्याली, हयात व कारनामे और उनके ‘तज़किरा रेख़ता गोयाने हिन्द’ की तनक़ीदी तदवीन ‘‘जो फ़ख़रुद्दीन अली अहमद’’ एकेडमी के सहयोग से छपा था, दूसरी किताबें ‘‘नमाज़ की किताब’’ उर्दू, हिन्दी, ‘‘इस्लामी निकाह’’ उूर्द हिन्दी ‘‘मय्यित के हुकूक़’’ उर्दू हिन्दी ‘‘जिन्नात का बयान’’ उर्दू ‘‘कवाइद उर्दू’’ आदि छप कर ख़त्म हो चुकी हैं, दोबारा छपने की उम्मीद कम है।